कौन तथा कैसा है परमेश्वर?

कौन तथा कैसा है परमेश्वर आज हम इस सवाल का जवाब इस पोस्ट के जरिये आपको देंगे।

जैसे भारत देश का प्रधानमंत्राी जी अपने पास गह विभाग रख लेता है। जब वह उस विभाग के दस्त्तावेजों पर हस्त्ताक्षर करताहै तो वहाँ गहमंत्राी की भूमिका करता है तथा अपना पद भी गहमन्त्राी लिखता है,हस्त्ताक्षर वही होते हैं।

इसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता को समझना है।जिन सन्तों व ऋषियों को परमात्मा प्राप्ति नहीं हुई, उन्होंने अपना अन्तिम अनुभव बताया है कि प्रभु का केवल प्रकाश देखा जा सकता है, प्रभु दिखाई नहीं देता क्योंकि उसका कोई आकार नहीं है तथा शरीर में धुन सुनना आदि प्रभु भक्ति की उपलब्धि है। आओ विचार करें – जैसे कोई अंधा अन्य अंधों में अपने आपको आँखों वाला सिद्ध किए बैठा हो और कहता है कि रात्राी में चन्द्रमा की रोशनी बहुत सुहावनीमन भावनी होती है, मैं देखता हूँ।

अन्य अन्धे शिष्यों ने पूछा कि गुरु जी चन्द्रमा कैसा होता है। चतुर अन्धे ने उत्तर दिया कि चन्द्रमा तो निराकार है वह दिखाईथोड़े ही दे सकता है। कोई कहे सूर्य निराकार है वह दिखाई नहीं देता रविस्वप्रकाशित है इसलिए उसका केवल प्रकाश दिखाई देता है। गुरु जी के बतायेअनुसार शिष्य 2) घण्टे सुबह तथा 2) घण्टे शाम आकाश में देखते हैं। परन्तु कुछदिखाई नहीं देता। स्वयं ही विचार विमर्श करते हैं कि गुरु जी तो सही कह रहेहैं, हमारी साधना पूरी 2) घण्टे सुबह 2) घण्टे शाम नहीं हो पाती। इसलिए हमंेसूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश दिखाई नहीं दे रहा। चतुर गुरु जी की व्याख्या परआधारित होकर उस चतुर अन्धे की (ज्ञानहीन) व्याख्या के प्रचारक करोड़ों अंधे(ज्ञानहीन) हो चुके हों। फिर उन्हें आँखों वाला (तत्वदर्शी सन्त) बताए कि सूर्यआकार में है और उसी से प्रकाश निकल रहा है। इसी प्रकार चन्द्रमा से प्रकाश निकल रहा है नेत्राहीनों!

चन्द्रमा के बिना रात्राी में प्रकाश कैसे हो सकता है? जैसेकोई कहे कि ट्यूब लाईट देखी, फिर कोई पूछे कि ट्यूब कैसी होती है जिसकीआपने रोशनी देखी है? उत्तर मिले कि ट्यूब तो निराकार होने के कारण दिखाई नहींदेती। केवल प्रकाश देखा जा सकता है। विचार करें:- ट्यूब बिना प्रकाश कैसा ?यदि कोई कहे कि हीरा स्वप्रकाशित होता है। फिर यह भी कहे कि हीरे काकेवल प्रकाश देखा जा सकता है, क्योंकि हीरा तो निराकार है, वह दिखाई थोड़ेही देता है, तो वह व्यक्ति हीरे से परिचित नहीं है। फोकट जौहरी बना है। जोपरमात्मा को निराकार कहते हैं तथा केवल प्रकाश देखना तथा धुन सुनना ही प्रभुप्राप्ति मानते हैं वे पूर्ण रूप से प्रभु तथा भक्ति से अपरिचित हैं। जब उनसे प्रार्थनाकी कि कुछ नहीं देखा है तुमने, अपने अनुयाइयों को भ्रमित करके दोषी हो रहेहो। न तो आपके गुरुदेव के तत्वज्ञान रूपी नेत्रा हैं और न ही आपको। इसलिए दुनियाँ को भ्रमित मत करो।

इस बात पर सर्व अज्ञान रूपी नेत्रों के अन्धों ने लट्ठउठा लिए कि हम तो झूठे, तूं एक सच्चा। आज वही स्थिति संत रामपाल जीमहाराज के साथ है।इस विवाद का निर्णय कैसे हो कि किस सन्त के विचार सही हैं किसके गलत हैं? मान लिजिए जैसे किसी अपराध के विषय में पाँच वकील अपना-अपना विचार व्यक्त कर रहे हैं।

एक कहे कि इस अपराध पर संविधान की धारा 301 लगेगी, दूसराकहे 302, तीसरा कहे 304, चैथा कहे 306 तथा पाँचवां वकील 307 को सही बताए। ये पाँचों ठीक नहीं हो सकते। केवल एक ही ठीक हो सकता है यदि उसकी व्याख्या अपने देश के पवित्रा संविधान से मिलती है। यदि उसकी व्याख्या भी संविधान के विपरीत है तो पाँचों वकील गलत हैं। इसका निर्णय देश का पवित्रा संविधान करेगा जो सर्व को मान्य होता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न विचार धाराओं में तथा साधनाओं में से कौन-सी शास्त्रा अनुकूल है या कौन-सी शास्त्रा विरुद्ध है? इसका निर्णय पवित्रा सद्ग्रन्थ ही करेंगे, जो सर्व को मान्य होना चाहिए (यही प्रमाण पवित्र श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में)

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