अवतार की परिभाषा

‘अवतार’ का अर्थ है ऊँचे स्थान से नीचे स्थान पर उतरना। विशेषकर यह शुभ शब्द उन उत्तम आत्माओं के लिए प्रयोग किया जाता है, जो धरती पर कुछ अद्धभुत कार्य करते हैं। जिनको परमात्मा की ओर से भेजा हुआ मानते हैं या स्वयं परमात्मा ही का पथ्वी पर आगमन मानते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16.17 में तीन पुरूषों (प्रभुओं) का ज्ञान है।

  1. क्षर पुरूष जिसे ब्रह्म भी कहते हैं। जिसका नाम साधना का है। जिसका प्रमाण गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में है।
  2. अक्षर पुरूष जिसको परब्रह्म भी कहते हैं। जिसकी साधना का मंत्र तत् जो सांकेतिक है। प्रमाण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में है।
  3. उत्तम पुरूष तूः अन्यः = श्रेष्ठ पुरूष परमात्मा तो उपरोक्त दोनों पुरूषों (क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष) से अन्य है। वह परम अक्षर पुरूष है जिसे गीता अध्याय 8 श्लोक 1 के उत्तर में अध्याय 8 के श्लोक 3 में कहा है कि वह परम अक्षर ब्रह्म है। इसका जाप सत् है जो सांकेतिक है। इसी परमेश्वर की प्राप्ति से साधक को परम शांति तथा सनातन परमधाम प्राप्त होगा। प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में यह परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) गीता ज्ञान दाता से भिन्न है। अधिक ज्ञान प्राप्ति के लिए कप्या पुस्तक ‘‘ज्ञान गंगा’’ सतलोक आश्रम बरवाला से प्राप्त करें। अवतार दो प्रकार के होते हैं। जैसे ऊपर कहा गया है। अब आप जी को पता चला कि मुख्य रूप से तीन पुरूष (प्रभु) है। जिनका उल्लेख ऊपर कर दिया गया है। हमारे लिए मुख्य रूप से दो प्रभुओं की भूमिका रहती है।
  1. क्षर पुरूष (ब्रह्म):- जो गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में अपने आप को काल कहता है।
  2. परम अक्षर पुरूष (परम अक्षर ब्रह्म):- जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक 3 तथा 8,9,10 में तथा गीता अध्याय 18 श्लोक 62 अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 17 में कहा है।

Download Official App Sant Rampal Ji Maharaj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *