गुरु व नाम महिमा की वाणी

गरीब, बिन उपदेश अचंभ है, क्यों जीवत हैं प्राण। बिन भक्ति कहाँ ठौर है, नर नाहिं पाषाण।।1।।
गरीब, एक हरि के नाम बिना, नारि कुतिया हो। गली-2 भौंकत फिरै, टूक ना डालै को।।2।।
गरीब, बीबी पड़दे रहैं थी, डयोढी लगती बार। गात उघाड़े फिरती हैं, बन कुतिया बाजार।।3।।
गरीब, नकबेसर नक से बनी, पहरत हार हमेल। सुन्दरी से सुनही (कुत्तिया) बनी, सुनि साहिब के खेल।4।
कबीर, हरि के नाम बिना, राजा ऋषभ होए। माटी लदै कुम्हार कै, घास ना डाले कोए।।5।।
कबीर, राम कष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन।। 6।।
कबीर, गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हरि की सेव। कहै कबीर स्वर्ग से, फेर दिया सुखदेव।।7।।
कबीर, राजा जनक से नाम ले, किन्हीं हरी की सेव (पूजा)। कहै कबीर बैकुण्ठ में, उल्ट मिले सुखदेव।।8।।
कबीर, सतगुरु के उपदेश का, लाया एक विचार। जै सतगुरु मिलते नहीं, जाता नरक द्वार।।9।।
कबीर, नरक द्वार में दूत सब, करते खैंचा तान। उनतें कबहु ना छुटता, फिर फिरता चारों खान।।10।।
कबीर, चार खानी में भ्रमता, कबहु ना लगता पार। सो फेरा सब मिट गया, सतगुरु के उपकार।।11।।
कबीर, सात समुन्द्र मसि करूं, लेखनी करूं बनराय। धरती का कागद करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।12।
कबीर, गुरु बड़े गोविन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरे सो रह गए, गुरु भजे हुए पार।।13।।
कबीर, गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागुं पाय। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दिया मिलाय।।14।।
कबीर, हरि के रूठतां, गुरु की शरण में जाय। कबीर गुरु जै रूठजां, हरि नहीं होत सहाय।।15।।

संत गरीबदास जी महाराज

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