कबीर जी तथा काल (ज्योति निरंजन) की वार्ता।।

उपरोक्त विवरण से सिद्ध होता है कि जो अनेक पंथ चले हुए हैं। जिनके पास कबीर साहेब द्वारा बताया हुआ सतभक्ति मार्ग नहीं है, ये सब काल (ज्योति निरंजन) प्रेरित हैं। अतः बुद्धिमान को चाहिए कि सोच-विचार कर भक्ति मार्ग अपनांए क्योंकि मनुष्य जन्म अनमोल है, यह बार-बार नहीं मिलता।

‘‘प्रमाण के लिए पवित्र कबीर सागर से भिन्न-भिन्न अध्यायों से अमृत बानी’’

अनुराग सागर के पृष्ठ 62 से :-

‘‘धर्मराय (ज्योति निरंजन) वचन‘‘

धर्मराय अस विनती ठानी।
मैं सेवक द्वितीया न जानी।।1
ज्ञानी बिनती एक हमारा।
सो न करहू जिह से हो मोर बिगारा।।2
पुरूष दीन्ह जस मोकहं राजु।
तुम भी देहहु तो होवे मम काजु।।3
अब मैं वचन तुम्हरो मानी।
लीजो हंसा हम सो ज्ञानी।।4

पृष्ठ 63 से अनुराग सागर की वाणी :-

दयावन्त तुम साहेब दाता।
ऐतिक कृपा करो हो ताता।।5
पुरूष शॉप मोकहं दीन्हा।
लख जीव नित ग्रासन कीन्हा।।6

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी :-

जो जीव सकल लोक तव आवै।
कैसे क्षुधा मोर मिटावै।।7
जैसे पुरूष कृपा मोपे कीन्हा।
भौसागर का राज मोहे दीन्हा।।8
तुम भी कृपा मोपर करहु।
जो माँगे सो मोहे देहो बरहु।।9
सतयुग, त्रेता, द्वापर मांहीं।
तीनों युग जीव थोड़े जाहीं।।10
चौथा युग जब कलयुग आवै।
तब तव शरण जीव बहु जावै।।11

पृष्ठ 65 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 3 से :-

प्रथम दूत मम प्रकटै जाई।
पीछे अंश तुम्हारा आई।।12

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 6 :-

ऐसा वचन हरि मोहे दीजै।
तब संसार गवन तव कीजै।।13

‘‘जोगजीत वचन=ज्ञानी बचन‘‘

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 7 :-

अरे काल (ज्योति निरंजन) तुम परपंच पसारा।
तीनों युग जीवन दुख डारा।।14
बीनती तोरी लीन्ह मैं जानि।
मोकहं ठगा काल अभिमानी।।15
जस बीनती तू मोसन कीन्ही।
सो अब बखस तोहे दीन्ही।।16
चौथा युग जब कलयुग आवै।
तब हम अपना अंश पठावैं।।17

‘‘धर्मराय (ज्योति निरंजन) वचन‘‘

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 17 :-

हे साहिब तुम पंथ चलाऊ।
जीव उबार लोक लै जाऊ।।18

पृष्ठ 66 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 8, 9, 16 से 21 :-

सन्धि छाप (सार शब्द) मोहे दिजे ज्ञानी।
जैसे देवोंगे हंस सहदानी।।19
जो जन मोकूं संधि (सार शब्द) बतावै। ताके निकट काल नहीं आवै।।20
कहै धर्मराय जाओ संसारा।
आनहु जीव नाम आधारा।।21
जो हंसा तुम्हरे गुण गावै।
ताहि निकट हम नहीं जावैं।।22
जो कोई लेहै शरण तुम्हारी।
मम सिर पग दै होवै पारी।।23
हम तो तुम संग कीन्ह ढिठाई।
तात जान किन्ही लड़काइ।।24
कोटिन अवगुन बालक करही।
पिता एक चित नहीं धरही।।25
जो पिता बालक कूं देहै निकारी।
तब को रक्षा करै हमारी।।26
सारनाम देखो जेहि साथा।
ताहि हंस मैं नीवाऊँ माथा।।27

ज्ञानी (कबीर) वचन

अनुराग सागर पृष्ठ 66 :-

जो तोहि देहुं संधि बताई।
तो तूं जीवन को हइहो दुखदाई।।28
तुम परपंच जान हम पावा।
काल (ज्योति निरंजन) चलै नहीं तुम्हरा दावा।।29
धर्मराय तोहि प्रकट भाखा।
गुप्त अंक बीरा हम राखा।।30
जो कोई लेई नाम हमारा।
ताहि छोड़ तुम हो जाना नियारा।।31
जो तुम मोर हंस को रोको भाई।
तो तुम काल रहन नहीं पाई।।32

‘‘धर्मराय (ज्योति निरंजन) बचन‘‘

पृष्ठ 62 तथा 63 से अनुराग सागर की वाणी :-

बेसक जाओ ज्ञानी संसारा।
जीव न मानै कहा तुम्हारा।।33
कहा तुम्हारा जीव ना मानै।
हमरी और होय बाद बखानै।।34
दृढ़ फंदा मैं रचा बनाई।
जामें सकल जीव उरझाई।।35
वेद-शास्त्र समर्ति गुणगाना।
पुत्र मेरे तीन प्रधाना।।36
तीनहू बहु बाजी रचि राखा।
हमरी महिमा ज्ञान मुख भाखा।।37
देवल देव पाषाण पुजाई।
तीर्थ व्रत जप तप मन लाई।।38
पूजा विश्व देव अराधी।
यह मति जीवों को राखा बाँधि।।39
जग (यज्ञ) होम और नेम आचारा।
और अनेक फंद मैं डारा।।40

‘‘ज्ञानी (कबीर) वचन‘‘

हमने कहा सुनो अन्याई।
काटों फंद जीव ले जांई।।41
जेते फंद तुम रचे विचारी।
सत्य शब्द ते सबै विडारी।।42
जौन जीव हम शब्द दृढ़ावैं।
फंद तुम्हारा सकल मुक्तावैं।।43
जबही जीव चिन्ही ज्ञान हमारा।
तजही भ्रम सब तोर पसारा।।44
सत्यनाम जीवन समझावैं।
हंस उभार लोक लै जावै।।45
पुरूष सुमिरन सार बीरा, नाम अविचल जनावहूँ।
शीश तुम्हारे पाँव देके, हंस लोक पठावहूँ।।46
ताके निकट काल नहीं आवै।
संधि देख ताको सिर नावै।।48
(संधि = सत्यनाम+सारनाम)

‘‘धर्मराय (ज्योति निरंजन) वचन‘‘

पंथ एक तुम आप चलऊ।
जीवन को सतलोक लै जाऊ।।49
द्वादश पंथ करूँ मैं साजा।
नाम तुम्हारा ले करों आवाजा।।50
द्वादश यम संसार पठाऊँ।
नाम कबीर ले पंथ चलाऊँ।।51
प्रथम दूत मेरे प्रगटै जाई।
पीछे अंश तुम्हारा आई।।52
यहि विधि जीवन को भ्रमाऊँ।
आपन नाम पुरूष का बताऊँ।।53
द्वादश पंथ नाम जो लैहि।
हमरे मुख में आन समैहि।।54

‘‘कबीर परमेश्वर जी की काल (ज्योति निरंजन) से वार्ता’’

जब परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मण्डों की रचना की और अपने लोक में विश्राम करने लगे। उसके बाद हम सभी अपने पिता सतपुरूष के लोक में सुख से रहने लगे। वहाँ किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। जन्म-मृत्यु का चक्र नहीं है। कुछ समय पश्चात् हम काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) के जाल में फंसकर इसको चाहने लगे। पिता ने दिल से त्याग दिया। ज्योति निरंजन के साथ हम सबको सतलोक से निकाल दिया। हम सब जीव ज्योति निरंजन के ब्रह्मण्ड में रहने लगे तथा अपना किया हुआ कर्मदण्ड भोगने लगे और बहुत दुःखी रहने लगे।

सुख व शांति की खोज में भटकने लगे और हमें अपने निज घर सतलोक की याद सताने लगी तथा वहाँ जाने के लिए भक्ति प्रारंभ की। किसी ने चारों वेदों को कंठस्थ किया तो कोई उग्र तप करने लगा और हवन यज्ञ, ध्यान, समाधि आदि क्रियाएं प्रारम्भ की, लेकिन अपने निज घर सतलोक नहीं जा सके क्योंकि उपरोक्त क्रियाएं करने से अगले जन्मों में अच्छे समृद्ध जीवन को प्राप्त होकर (जैसे राजा-महाराजा, बड़ा व्यापारी, अधिकारी, देव-महादेव, स्वर्ग-महास्वर्ग आदि) वापिस लख चौरासी भोगने लगे। बहुत परेशान रहने लगे और परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे कि हे दयालु ! हमें निज घर का रास्ता दिखाओ। हम हृदय से आपकी भक्ति करते हैं। आप हमें दर्शन क्यों नहीं दे रहे हो?

यह वृतान्त कबीर साहेब ने धर्मदास जी को बताते हुए कहा कि धर्मदास इन जीवों की पुकार सुनकर मैं अपने सतलोक से अपने पुत्र जोगजीत का रूप बनाकर काल लोक में आया। तब इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में जहां ज्योति निरंजन का निज घर है वहां पर तप्तशिला पर जीवों को भूनकर सूक्ष्म शरीर से गंध निकाला जा रहा था।

मेरे पहुंचने के बाद उन जीवों की जलन समाप्त को गई। उन्होंने मुझे देखकर कहा कि हे पुरुष ! आप कौन हो? आपके दर्शन मात्रा से ही हमें बड़ा सुख व शांति का आभास हो रहा है। फिर मैंने बताया कि मैं पारब्रह्म परमेश्वर कबीर हूँ। आप
सब जीव मेरे लोक से आकर काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) के लोक में फंस गए हो। यह ज्योति निरंजन रोजाना एक लाख मानव के सूक्ष्म शरीर से गंध निकाल कर खाता है और बाद में नाना-प्रकार की योनियों में दण्ड भोगने के लिए छोड़ देता है।

तब वे जीवात्माएं कहने लगी कि हे दयालु परमेश्वर! हमें इस ज्योति निरंजन की जेल से छुड़वाओ। मैंने बताया कि यह ब्रह्मण्ड काल (ज्योति निरंजन) ने तीन बार भक्ति करके मेरे से प्राप्त किए हुए हैं जो आप यहां सब वस्तुओं का प्रयोग कर रहे हो ये सभी काल (ज्योति निरंजन) की हैं और आप सब अपनी इच्छा से घूमने के लिए आए हो। इसलिए अब आपके ऊपर काल ब्रह्म का बहुत ज्यादा ऋण हो चुका है और वह ऋण मेरे सच्चे नाम के जाप के बिना नहीं उतर सकता।

जब तक आप ऋण मुक्त नहीं हो सकते तब तक आप काल ब्रह्म की जेल से बाहर नहीं जा सकते। इसके लिए आपको मुझसे नाम उपदेश लेकर भक्ति करनी होगी। तब मैं आपको
छुड़वा कर ले जाऊंगा। हम यह वार्ता कर ही रहे थे कि वहां पर काल ब्रह्म प्रकट हो गया और उसने बहुत क्रोधित होकर मेरे ऊपर हमला बोला। मैंने अपनी शब्द शक्ति से उसको मुर्छित
कर दिया। फिर कुछ समय बाद वह होश में आया।

मेरे चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा और बोला कि आप मुझ से बड़े हो, मुझ पर कुछ दया करो और यह बताओ कि आप मेरे लोक में किसलिए आए हो ? तब मैंने काल पुरुष को बताया कि कुछ जीवात्माएं भक्ति करके अपने निज घर सतलोक में वापिस जाना चाहती हैं। उन्हें सतभक्ति मार्ग नहीं मिल रहा है।

इसलिए वे भक्ति करने के बाद भी इसी लोक में रह जाती हैं। मैं उनको सतभक्ति मार्ग बताने के लिए और तेरा भेद देने के लिए आया हूं कि तूं काल है, एक लाख जीवों का आहार करता है और सवा लाख जीवों को उत्पन्न करता है तथा भगवान बन कर बैठा है। मैं इनको बताऊंगा कि तुम जिसकी भक्ति करते हो वह भगवान नहीं, काल है। इतना सुनते ही काल बोला कि यदि
सब जीव वापिस चले गए तो मेरे भोजन का क्या होगा ?

मैं भूखा मर जाऊंगा। आपसे मेरी प्रार्थना है कि तीन युगों में जीव कम संख्या में ले जाना और सबको मेरा भेद मत देना कि मैं काल हूँ, सबको खाता हूँ। जब कलियुग आए तो चाहे जितने जीवों को ले जाना। ये वचन काल ने मुझसे प्राप्त कर लिए। कबीर साहेब ने धर्मदास को आगे बताते हुए कहा कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग में भी मैं आया था और बहुत जीवों को सतलोक लेकर गया लेकिन इसका भेद नहीं बताया। अब मैं कलियुग में आया हूं और काल से मेरी वार्ता हुई है। काल ब्रह्म ने मुझ से कहा कि अब आप चाहे जितना जोर लगा लेना, आपकी बात कोई नहीं सुनेगा। प्रथम तो मैंने जीव को भक्ति के लायक ही नहीं छोड़ा है।

उनमें बीड़ी, सिगरेट, शराब, मांस आदि दुर्व्यसन की आदत डाल कर इनकी वृति को बिगाड़ दिया है। नाना-प्रकार की पाखण्ड पूजा में जीवात्माओं को लगा दिया है। दूसरी बात यह होगी कि जब आप अपना ज्ञान देकर वापिस अपने लोक में चले जाओगे। उससे पहले मैं (काल) अपने दूत भेजकर आपके पंथ से मिलते-जुलते बारह पंथ चलाकर जीवों को भ्रमित कर दूंगा। महिमा सतलोक की बताएंगे, आपका ज्ञान कथेंगे लेकिन नाम-जाप मेरा करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप मेरा ही भोजन बनेंगे।

यह बात सुनकर कबीर साहेब ने कहा कि आप अपनी कोशिश करना, मैं सतमार्ग बताकर ही वापिस जाऊंगा और जो मेरा ज्ञान सुन लेगा वह तेरे बहकावे में कभी नहीं आएगा। सतगुरु कबीर साहेब ने कहा कि हे ज्योति निरंजन ! यदि मैं चाहूं तो तेरे सारे खेल को क्षण भर में समाप्त कर सकता हूँ, परंतु ऐसा करने से मेरा वचन भंग होता है। यह सोच कर मैं अपने प्यारे हंसों को यथार्थ ज्ञान देकर शब्द का बल प्रदान करके सतलोक ले जाऊंगा और कहा कि –

कह कबीर सुनो धर्मराया, हम शंखों हंसा पद परसाया।
जिन लीन्हा हमरा प्रवाना, सो हंसा हम किए अमाना।।

(पवित्र कबीर सागर में जीवों को काल (ज्योति निरंजन) ब्रह्म द्वारा भूल-भूलइयां में डालने के लिए तथा अपनी भूख को मिटाने के लिए तरह-2 के तरीकों का वर्णन)

द्वादस पंथ करूं मैं साजा, नाम तुम्हारा ले करूं अवाजा।
द्वादस यम संसार पठहो, नाम तुम्हारे पंथ चलैहो।।
प्रथम दूत मम प्रगटे जाई, पीछे अंश तुम्हारा आई।
यही विधि जीवनको भ्रमाऊं, पुरुष नाम जीवन समझाऊं।।
द्वादस पंथ नाम जो लैहे, सो हमरे मुख आन समै है।
कहा तुम्हारा जीव नहीं माने, हमारी ओर होय बाद बखानै।।
मैं दृढ़ फंदा रची बनाई, जामें जीव रहे उरझाई।
देवल देव पाषान पूजाई, तीर्थ व्रत जप-तप मन लाई।।
यज्ञ होम अरू नेम अचारा, और अनेक फंद में डारा।
जो ज्ञानी जाओ संसारा, जीव न मानै कहा तुम्हारा।।

(सतगुरु वचन)

ज्ञानी कहे सुनो अन्याई, काटो फंद जीव ले जाई।।
जेतिक फंद तुम रचे विचारी, सत्य शबद तै सबै बिंडारी।।
जौन जीव हम शब्द दृढावै, फंद तुम्हारा सकल मुकावै।।
चौका कर प्रवाना पाई, पुरुष नाम तिहि देऊं चिन्हाई।।
ताके निकट काल नहीं आवै, संधि देखी ताकहं सिर नावै।।

उपरोक्त विवरण से सिद्ध होता है कि जो अनेक पंथ चले हुए हैं। जिनके पास कबीर साहेब द्वारा बताया हुआ सतभक्ति मार्ग नहीं है, ये सब काल (ज्योति निरंजन) प्रेरित हैं। अतः बुद्धिमान को चाहिए कि सोच-विचार कर भक्ति मार्ग अपनांए क्योंकि मनुष्य जन्म अनमोल है, यह बार-बार नहीं मिलता।

कबीर साहेब कहते हैं कि :-

कबीर मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारम्बार।
तरूवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर न लगता डारि।।

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  1. सतगुरु पूर्ण ब्रह्म हैं, सतगुरु आप आलेख ।
    सतगुरु रमता राम हैं, या में मीन न मेख ।।